ड्रेगनफ्लाई इकोसिस्टम का संकेतक है

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन और सुशील चंदानी

बच्चों की कल्पना में उड़ने का एक खास स्थान है। आकाश में उड़ते परिंदों को निहारना और कागज़ के हवाई जहाज़ बनाकर उड़ाना तो होता ही है, जबकि ड्रेगनफ्लाई हेलिकॉप्टर का नज़ारा पेश करते हैं।

ड्रेगनफ्लाई को हिंदी में शायद व्याध पतंगा या सितारा भी कहते हैं लेकिन आम बोलचाल में तो यह हेलिकॉप्टर ही है। ये कीट जिस समूह के सदस्य हैं उनके पूर्वज संभवत: पृथ्वी पर पहले-पहले उड़ने वाले जीवों में थे। लगभग 30 करोड़ वर्ष पूर्व इनके पूर्वजों में उड़ान सम्बंधी रचनाएं तो ऐसी ही थीं लेकिन उनके पंखों का फैलाव काफी ज़्यादा था – लगभग 72 सेंटीमीटर (करीब ढाई फीट) तक। यानी उस समय की ड्रेगनफ्लाई को देखते तो भौंचक्के रह जाते हम।

ड्रेगनफ्लाई कीटों के जिस गण (ऑर्डर) में शामिल हैं उसे ओडोनेटा कहते हैं। इस गण में ड्रेगनफ्लाई के अलावा डेमसलफ्लाई भी शामिल हैं। भारत में ड्रेगनफ्लाई की 600 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनकी नई-नई प्रजातियां भी खोजी जाती रही हैं, खास तौर से उत्तर-पूर्वी राज्यों में या कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु संगम स्थल पश्चिमी घाट क्षेत्र में। लेकिन अफसोस की बात है कि इकोलॉजिकल सर्वेक्षणों में बढ़ते क्रम में ड्रेगनफ्लाई प्रजातियों के गायब होते जाने और आबादियों के सिकुड़ने की बात सामने आ रही है। जहां दुनिया भर में आजकल सारा ध्यान बड़े स्तनधारियों पर टिक गया है, वहां इन प्राचीन कीटों पर ध्यान देने की क्या ज़रूरत है? 

ड्रेगनफ्लाई: भारत की नमभूमियों की पहचान

ओडोनेटा गण के सदस्यों का एक उल्लेखनीय लक्षण यह है कि उनका जीवन चक्र दो भागों में स्पष्ट रूप से बंटा होता है। शुरुआती अवस्था में ये जलचर होते हैं जबकि वयस्क अवस्था में थलचर और हवाई होते हैं। इनके लार्वा (निम्फ) दलदल, तालाबों या बहते पानी में रहते हैं। दूसरी ओर, वयस्क हवा में मंडराते हैं, और चार पंखों के सहारे तेज़ गति से उड़ते हैं। खास बात यह कि इनके इन चारों पंखों का संचालन एक-दूसरे से स्वतंत्र होता है। इसके चलते वे हवा में एक ही जगह मंडराते रह सकते हैं, आगे और पीछे की ओर उड़ सकते हैं।

बहरहाल, दोनों अवस्थाओं में ड्रेगनफ्लाई काफी प्रमुख शिकारी कीट होते हैं। निम्फ मच्छरों और अन्य कीटों के लार्वा और प्यूपा का भक्षण करते हैं। एक बढ़ता ड्रेगनफ्लाई निम्फ एक दिन में सैकड़ों लार्वा का सफाया कर सकता है। पानी भरे धान के खेतों में निम्फ फसली कीटों की जलचर अवस्थाओं का भक्षण करते हैं। दूसरी ओर, वयस्क ड्रेगनफ्लाई लीफहॉपर्स और अन्य हानिकारक कीटों का शिकार करते हैं।

वैसे, ड्रेगनफ्लाई स्वयं भी शिकार बन जाते हैं। एक तो ओडोनेटा गण के सदस्य कीटनाशकों से मारे जाते हैं। इनका सफाया खास तौर से फिप्रोनिल जैसे तंत्रगत कीटनाशकों से होता है। तंत्रगत कीटनाशक ऐसे रसायन होते हैं जो पौधों में अवशोषित हो जाते हैं और पूरे पौधे को विषाक्त कर देते हैं। लिहाज़ा, लंबे समय तक ऐसे कीटनाशकों का उपयोग ड्रेगनफ्लाई की घटती आबादी का कारण बनता है। दरअसल, खेतिहर इलाकों में ड्रेगनफ्लाई और उनके निम्फों की स्वस्थ आबादी एक भलीभांति प्रबंधित कृषि, जहां कीटनाशकों का नियंत्रित इस्तेमाल किया जाता है, का लक्षण होता है।

और तो और, मानव-प्रभावों से परे भी ड्रेगनफ्लाई आबादियों पर बदलते पर्यावरण का असर पड़ रहा है। पश्चिमी घाट की कुछ प्रजातियां ऐसे जंगलों में फलने-फूलने के लिए अनुकूलित हो चली हैं जहां गीली दलदली मिट्टी में से पानी रिसकर पहाड़ी नालों में बहता है। हाल के वर्षों में सूखे और अत्यधिक बारिश का चक्र कई स्थानिक भारतीय प्रजातियों के लिए कठोर रहा है। जैसे चटख रंगों और हरी-नीली आंखों वाला ड्रेगनफ्लाई ब्लू हॉकलेट (Hylaeothemis apicalis)। आजकल यह बहुत कम नज़र आता है।

जब हम ड्रेगनफ्लाई और डेमसेलफ्लाई को अपनी इकोसिस्टम की सेहत के संकेतक के रूप में देखते हैं, तो हमें ऐसे नए-नए पहलू दिखते हैं जो इन्हें अनोखा बनाते हैं। उदाहरण के लिए, यह तो पहले से पता था कि इन कीटों की आंखें इन्हें पूरे 360 डिग्री का दृश्य क्षेत्र प्रदान करती हैं। एक हालिया अध्ययन में पता चला है कि ड्रेगनफ्लाई में 16 या उससे भी अधिक जीन्स होते हैं जो विज़ुअल ऑप्सिन बनाते हैं। विज़ुअल ऑप्सिन्स वे प्रोटीन्स होते हैं जो प्रकाश और रंग को ताड़ने में मदद करते हैं। तुलना के लिए देखें कि मनुष्यों के रेटिना में मात्र चार विज़ुअल ऑप्सिन होते हैं: शंकु कोशिकाओं में तीन (लाल, हरे, और नीले रंग के लिए एक-एक) और चौथा छड़ कोशिकाओं में प्रकाश संवेदना के लिए। इस तरह की आणविक प्रचुरता ड्रेगनफ्लाई को अत्यंत संवेदनशील बनाती है और उन्हें पराबैंगनी प्रकाश को भांपने में भी सक्षम बनाती है।

चाहे उनकी संख्या में गिरावट आ रही है लेकिन ये मनमोहक प्राणी हमें रोज़ाना नई बातें दिखा रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

Photo credit – https://agincourtresources.com/2026/09/04/understanding-dragonflies-as-bioindicators-of-environmental-quality/

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