भौतिकी का नोबेल

इस साल का भौतिकी नोबेल पुरस्कार विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय के फ्रांसिस हाल्ज़ेन को न्यूट्रिनो कणों सम्बंधी शोध कार्य तथा आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला में उनके निर्णायक योगदान व नेतृत्व के लिए दिया गया है।

सामान्य लोगों के लिए न्यूट्रिनो का महत्व स्वत: स्पष्ट नहीं है। दरअसल, न्यूट्रिनो की उपस्थिति का सुझाव सबसे पहले वोल्फगैंग पौली ने 1930 में दिया था। उन्होंने यह सुझाव रेडियोसक्रिय तत्वों के विघटन के वर्णक्रम के एक विशेष पहलू की व्याख्या के लिए दिया था। यह प्रस्ताव कतिपय गणनाओं पर आधारित था, न्यूट्रिनो को एक वास्तविक कण के रूप में खोजना ज़रूरी था। न्यूट्रिनो का पहला प्रायोगिक प्रमाण वर्ष 1956 में सी. कोवान और एफ. राइन्स ने प्रस्तुत किया था। उन्होंने नाभिकीय रिएक्टर का उपयोग एंटी-इलेक्ट्रॉन न्यूट्रिनो के स्रोत के तौर पर किया था। 1995 में राइन्स को अकेले ही ‘न्यूट्रिनो को ताड़ने’ के लिए नोबेल सम्मान दिया गया क्योंकि तब तक कोवान का निधन हो चुका था।

इसके बाद न्यूट्रिनो अनुसंधान के लिए कई नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं। राइन्स व कोवान द्वारा खोजे जाने के बाद फौरन यह समझ बन गई थी कि ये कण ब्रह्मांड से सूचनाएं प्राप्त करने के लिए आदर्श हैं। सबसे बड़ी बात तो यह पता चली थी कि न्यूट्रिनो विद्युतीय दृष्टि से उदासीन होते हैं। लिहाज़ा, ये मात्र दुर्बल नाभिकीय अथवा गुरुत्वीय अंतर्क्रिया में शामिल होते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अपने दूरस्थ ब्रह्मांडीय स्रोत से निकलकर ये पृथ्वी तक बगैर किसी व्यवधान या विचलन के पहुंचते हैं। इस संदर्भ में 2002 में आर. डेविस जूनियर और एम. कोशिबा को ब्रहमांडीय न्यूट्रॉन के डिटेक्शन के लिए नोबेल से नवाज़ा गया था। उन्होंने सूरज से आने वाले और डेढ़ लाख वर्ष पूर्व घटित एक सुपरनोवा से पृथ्वी पर पहुंचने वाले मेगाइलेक्ट्रॉनवोल्ट न्यूट्रिनो का अवलोकन किया था।

फ्रांसिस हाल्ज़ेन का योगदान यह रहा कि उन्होंने यह पहचाना कि दणिक्षी ध्रुव के बर्फ का इस्तेमाल न्यूट्रिनो के अध्ययन हेतु किया जा सकता है। वैसे तो न्यूट्रिनो हर जगह होते हैं लेकिन वे अन्य कणों या बलों से इतनी कम अंतर्क्रिया करते हैं कि उन्हें पकड़ पाना मुश्किल होता है। वे पृथ्वी में से या हमारे शरीर में से होकर गुज़र जाते हैं और हमें पता भी नहीं चलता।

बहुत ही कम ऐसा होता है कि कोई न्यूट्रिनो किसी परमाणु के नाभिक से अंतर्क्रिया करता है। इस क्षण यदि कोई व्यक्ति सही जगह पर सही उपकरणों के साथ मौजूद हो तो इसे भांपा जा सकता है।

यह बात तो वैज्ञानिकों को एक अरसे से पता रही है कि ब्रह्मांड में कुदरती पार्टिकल एक्सलरेटर मौजूद हैं जो हमारे द्वारा निर्मित एक्सलरेटर की तुलना में लाखों गुना अधिक ऊर्जावान कण छोड़ते रहते हैं। लेकिन इन स्रोतों के बारे में हम बहुत कम जान पाए थे। वैसे तो न्यूट्रिनो भी उन्हीं परिवेशों

में उत्पन्न होते हैं, जहां अन्य कण बनते हैं लेकिन ये अपनी ऊर्जा गंवाए बगैर और दिशा बदले बगैर पृथ्वी तक पहुंचते हैं। अर्थात ये उन स्रोतों के सम्बंध में अनोखी जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं।

हाल्ज़ेन ने दक्षिण ध्रुव पर न्यूट्रिनो को ताड़ने व उनका अध्ययन करने का विचार 1988 में पेश किया था। जब कोई न्यूट्रिनो किसी परमाणु नाभिक से अंतर्क्रिया करता है तो प्रकाश की एक चमक पैदा होती है जिसे दक्षिणी ध्रुव के स्वच्छ बर्फ में पकड़ा जा सकता है। दक्षिणी ध्रुव के कई फायदे हैं – जैसे यह तमाम किस्म के व्यवधानों से मुक्त है और भूकंपों के अभाव के चलते भौगोलिक दृष्टि से स्थिर है। हाल्ज़ेन के विचार को कई शोधकर्ताओं का समर्थन मिला और बर्फ में सेंसर्स स्थापित करने का शुरुआती परीक्षण किया गया।

वैसे, अत्यंत ऊर्जावान ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो बहुत दुर्लभ होते हैं, इसलिए पर्याप्त संख्या में न्यूट्रिनो और परमाणु नाभिकों की टक्करों को पकड़ने के लिए भारी मात्रा में बर्फ की ज़रूरत थी। लिहाज़ा, पूरे 1 घन किलोमीटर बर्फ में फैली आइसक्यूब वेधशाला का निर्माण 2011 में पूरा हुआ था। इस बर्फ का वज़न होगा 1 अरब मीट्रिक टन।

इस वेधशाला की मदद से ऐसे न्यूट्रिनो की खोज की गई जो हमारे सौर मंडल के बाहर उत्पन्न हुए थे। हाल्ज़ेन के नेतृत्व में काम कर रही अंतर्राष्ट्रीय टीम ने एक अनोखा उपकरण उपलब्ध कराया है जो खगोल शास्त्रीय अध्ययनों के एक नए युग का आगाज़ करेगा। (स्रोत फीचर्स)

Photo credit- https://www.nobelprize.org/uploads/2026/10/fig_fy_26_3x2.jpg

प्रातिक्रिया दे