
डॉ. किशोर पंवार
आज भी देश के मेलों और सर्कसों में खतरनाक स्टंट ‘मौत का कुआं’ एक आकर्षण होता है। मौत के कुएं में मोटरसाइकिल और छोटी कार या जीप तेज़ी से दौड़ाई जाती हैं। इस रोमांचक खेल में दौड़ती मोटर साइकिल और कारें कुएं की दीवार से आड़ी स्थिति में चिपकी घूमती रहती हैं, गिरती नहीं हैं, और ना ही आपस में टकराती हैं। यही इस खेल का असली रोमांच होता है।
प्रकृति के मौत के कुएं
ऐसा ही एक रोमांचक और खतरनाक स्टंट प्रकृति में भी होता है। प्रकृति में ये मौत के कुएं या तो ज़मीन पर बिछे रहते हैं या बेलों पर लटके रहते हैं। ये मौत के कुएं बोर्नियो, जावा, सुमात्रा, मलेशिया और सिंगापुर के उष्ण-कटिबंधीय (ट्रॉपिकल) जंगलों में मिलते हैं। हमारे देश में भी मेघालय की खासी पहाड़ियों पर ये मिलते हैं। ये खुले-रेतीले या नम क्षेत्र में पाए जाते हैं।
दरअसल, ये मांसाहारी या कीटभक्षी पौधे हैं जिन्हें वनस्पति शास्त्र के नेपेंथीस वंश के अंतर्गत रखा गया है। दुनिया भर में नेपेंथीस वंश के 170 तरह के रूप-रंग वाले ‘कुएं’ पाए जाते हैं। ये मुख्य रूप से घड़े या सुराही के आकार के होते हैं।

इन मौत के कुएं में स्टंटबाज़ यानी शिकार मीठे सुगंधित रस के लालच के कारण फंसता है। और एक बार धोखे में आ जाने के बाद बचता नहीं, और आखिरकार इन कुओं में गिरता चला जाता है। ये प्राकृतिक, चटकीले और रसभरे कुएं वास्तव में विभिन्न प्रकार के कीट पतंगों, मेंढक, छिपकलियों और कई बार तो चूहों के लिए भी असली मौत के कुएं साबित होते हैं। ये स्टंटबाज़ आते तो दावत के लालच में हैं लेकिन खुद भोजन बन जाते हैं।
यह तो जानी-मानी बात है कि सभी जीवों को अपनी ऊर्जा सम्बंधी आवश्यकताओं के लिए भोजन की ज़रूरत होती है। इसी के दम पर चलना-फिरना, सांस लेना जैसे दैनिक क्रियाकलाप चलते हैं। शारीरिक वृद्धि और टूट-फूट की मरम्मत के लिए भी भोजन की आवश्यकता होती है। लिहाज़ा पोषण जीव जगत की एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। जीवों को भोजन, दूसरे जीवों के भक्षण या मृत कार्बनिक पदार्थ के अवशोषण से मिलता है या प्रकाश संश्लेषण की महत्वपूर्ण प्रक्रिया से मिलता है जिसमें जीव अपना पोषण अजैविक पदार्थों से बनाते हैं।
ऊपर जिन प्राकृतिक मौत के कुओं की बात की गई थी, वे खाली नहीं होते। इनमें भरा होता है एक खास प्रकार का चिपचिपा तरल पदार्थ जिसके खास गुणों की पहचान हाल ही में कुछ वैज्ञानिकों ने की है। इन घड़ों में भरा पाचक तरल अत्यंत चिपचिपा और लचीला होता है। यह एक ऐसा पाचक दलदल होता है जिसमें एक बार गिरने के बाद बाहर निकलना असंभव होता है। शिकार बाहर निकलने की जितनी कोशिश करता है उतना ही अंदर धंसता जाता है।
यहां हम नेपंथिस की एक प्रजाति नेपेंथीस रेफ्लेसियाना की चर्चा करेंगे। यह ज़मीन पर रेंगने वाली बेल है, परंतु कोई सहारा मिलने पर उस पर चढ़ भी जाती है। अपनी खास रूपांतरित पत्तियों की मदद से 15 मीटर की ऊंचाई तक चढ़ सकती है। इसके घड़े सुराही नुमा या एक बड़े कप के आकार के होते हैं।
मौत का कुआं कैसे
दरअसल, ये मौत के कुएं सामान्य पत्ती के ही बदले हुए रूप हैं। एक सामान्य पत्ती में एक आधार, छोटा डंठल, एक चौड़ा चपटा फलक और एक शीर्ष होता है। यही चार हिस्से कीटभक्षी पौधों की पत्ती में रूपांतरित होकर मौत के घड़े बन जाते हैं।

पत्ती का आधार चपटा होकर हरा हो जाता है और प्रकाश संश्लेषण करता है। डंठल फैल कर लंबा हो जाता है और प्रतान (टेंड्रिल) बनाता है जो पौधे को ऊपर चढ़ने में और घड़े को सीधा रखने में मदद करता है। पत्ती का चपटा हिस्सा यानि फलक खोखला होकर घड़ा बन जाता है। सामान्य पत्ती का जो शीर्ष होता है वह यहां पर एक ढक्कन बन जाता है जो बारिश के पानी को अंदर जाने से रोकता है और कीट पतंगों को लुभाने का काम करता है।
फिसलन भरे रास्ते
इन लुभावने घड़ों का सबसे प्रमुख और बहुत ही आकर्षक हिस्सा इसका मुंह होता है जिसे पेरिस्टोम कहते हैं। ये गज़ब के नक्काशीदार, चमकीले और चिपचिपे होते हैं। जब इनकी चमक-दमक से आकर्षित होकर मक्खियां और चीटियां पेरिस्टोम पर बैठती हैं तो वे अपने पांव जमाने की कोशिश में और फिसलती जाती हैं और अंत में इस मौत के कुएं में गिर जाती हैं, जिसके पेदें में एक विशेष प्रकार का पाचक रस भरा होता है।
पाचक पदार्थ का दलदल
फ्रांस के राष्ट्रीय वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र और मॉन्टपैलियर विश्वविद्यालय की इकोलॉजिस्ट लॉरेंस गोम ने इस पर अध्ययन किया है और उनका कहना है कि यह तरल पाचक पदार्थ एक दलदल जैसा है इसमें गिरा शिकार निकलने का जितना प्रयास करता है उतनी ही तेज़ी से वह डूबता जाता है, धंसता जाता है।
गोम ने 2000 के दशक की शुरुआत में अपने शोध कार्य के दौरान नेपेंथीस रैफ्लेसियाना के पाचक द्रव के इस असामान्य गुण को पहली बार देखा और उन्होंने पता लगाया कि क्या इससे इसकी कीट पकड़ने की क्षमता का पता चल सकता है। उन्हें इस तरल पदार्थ की दो विशेषताओं ने चौंका दिया। पहला घड़े के द्रव का अत्यधिक गाढ़ापन और दूसरा इसकी अत्यधिक श्यानता (विस्कोसिटी)। और इससे भी ज़्यादा असामान्य बात उन्हें यह लगी कि जब इस पाचक रस को दो उंगलियों के बीच में खींचा गया तो इसने पतला धागा बना लिया जो उसकी गज़ब की लोच का संकेत था। यह हमारे यहां बनाई जाने वाली मिठाइयों की एक तार की या दो तार की चाशनी की तरह था।
पाचक पदार्थ के भौतिक गुण
घड़े में पाचक द्रव के भौतिक गुणों की जांच फ्रेंच नेशनल सेंटर और फ्रांस में एक्स मार्सेले युनिवर्सिटी के भौतिक शास्त्री एल. फोर्टर के दल ने की। 2007 में उन्होंने बताया कि इस द्रव में जब कीटों की हरकतों को सिम्युलेट किया गया तो पता चला कि इसकी श्यानता सामान्य द्रव की तुलना में 10,000 गुना ज़्यादा थी। जो इस द्रव के लंबे पॉलिसैकेराइड अणुओं के कारण है। इस दल ने यह भी पता लगाया कि क्या घड़े में बारिश का पानी भर जाने पर इसका लचीलापन कम हो जाता है। उन्होंने इसके अलग-अलग सांद्रता वाले द्रव में चींटियों को ढकेला तो पाया कि यह लचीलापन 95 प्रतिशत पतला करने पर भी काफी असरदार बना रहता है।
इस घड़े को अपने शिकार को पकड़ने और पचाने के लिए सही मात्रा में द्रव का स्तर बनाए रखना होता है लेकिन ट्रॉपिकल वनों में कभी बारिश के पानी में घड़ा ज़्यादा भर जाता है तो कभी गर्मी में सूखे के कारण पाचक द्रव सूख जाता है।
एंड्रूयू और साथियों ने यह भी पता लगाया कि एक घड़े के पाचक द्रव के स्तर में होने वाले यह बदलाव कीटों को फंसाने की क्षमता पर किस तरह प्रभाव डालते हैं और क्या पौधे अपने पाचक द्रव के स्तर को सक्रिय रूप से नियंत्रित करते हैं। नतीजे आश्चर्यजनक थे। और जवाब था: हां, ये घड़े सक्रिय रूप से ऐसा करते हैं।
इस पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि घड़े में तरल पदार्थ की मात्रा बारिश और वाष्पीकरण से प्रभावित होती है। जो इन घड़ों द्वारा शिकार पकड़ने की क्षमता को प्रभावित करती है। घड़े में द्रव बहुत अधिक हो या बहुत कम हो तो प्रतिकूल असर होता है। घड़े में तरल पदार्थ की कमी होने पर सही स्तर बनाए रखने के लिए पौधा पानी स्रावित करता है और अधिक होने पर उसे अवशोषित कर लेता है। तरल पदार्थ के स्तर को बनाए रखने का नियंत्रण खुले आवासों में एक ऐसा अनुकूलन है जिसके बारे में पहले पता नहीं था।
घड़े में तरल पदार्थ को नियंत्रित करना इन मांसाहारी पौधों के लिए आवश्यक है जो अपने शिकार को फंसाने के लिए खुले तरल पदार्थ का उपयोग करते हैं और खुले आवास में रहते हैं। जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और आवास के ह्रास व तेज़ी से बिगड़ती मौसमी परिस्थितियों के चलते इन आश्चर्यजनक पौधों की आबादियां दुनिया भर में खतरे में हैं। (स्रोत फीचर्स)