युवाओं से ज़्यादा एंटीबॉडी बुज़ुर्गों में

शंघाई के एक अस्पताल से फरवरी में डिस्चार्ज हुए कोरोना के हल्के संक्रमण वाले 175 लोगों की जांच में बुज़ुर्गों में युवाओं के मुकाबले वायरस निष्क्रिय करने वाली एंटीबॉडी ज़्यादा पाई गई हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि अधेड़ उम्र से लेकर बुज़ुर्ग मरीज़ों के प्लाज़्मा में निष्क्रियकारी और स्पाइक से जुड़ने वाली एंटीबॉडी का स्तर तुलनात्मक रूप से ज़्यादा था। 30 फीसदी युवाओं में तो उम्मीद के उलट एंटीबॉडी का स्तर मानक से कम पाया गया। 10 में तो इनका स्तर इतना कम था कि ये पकड़ में ही नहीं आ पार्इं। वहीं, सिर्फ 2 मरीज़ों में एंटीबॉडी का स्तर बहुत अधिक था।

वैज्ञानिकों को मरीज़ों के नमूनों से वायरल डीएनए का पता न लग पाने के कारण इनमें संक्रमण के स्तर का सही आकलन नहीं हो पाया। इसलिए यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया है कि क्या युवाओं में संक्रमण हल्का होने के कारण ही एंटीबॉडी कम बनी थीं।

इस परिणाम से वैज्ञानिक भी चकित हैं। दरअसल, अधिक एंटीबॉडी होने के बाद भी बुज़ुर्ग जल्दी ठीक नहीं हो पाए थे। यानी बुज़ुर्ग और युवा मरीज़ों को ठीक होने में एक समान समय लगा। ठीक हुए इन लोगों की बीमारी की औसत अवधि 21 दिन, अस्पताल में भर्ती रहने का औसत समय 16 दिन और औसत आयु 50 साल थी।

वैज्ञानिकों का कहना है कि बुज़ुर्गों में एंटीबॉडी का अधिक स्तर उनके मज़बूत प्रतिरक्षा तंत्र के कारण भी हो सकता है। हालांकि, सिर्फ एंटीबॉडी की अधिक उपस्थिति के कारण उनमें गंभीर संक्रमण से बचाव के पुख्ता प्रमाण नहीं मिले हैं। दुनिया भर में तो देखा गया है कि कोरोना के प्रति बुज़ुर्ग ज़्यादा कमज़ोर हैं।

शोधकर्ताओं ने मरीज़ों में संक्रमण के 10-15 दिन में ही कोरोना वायरस के लिए बनने वाली निष्क्रियकारी एंटीबॉडी ढूंढ ली थी, जिनका स्तर बाद तक भी स्थिर ही रहा। युवाओं में कम एंटीबॉडी के चलते उनके दोबारा संक्रमित होने की आशंका पर शोधकर्ताओं ने गहन अध्ययन की ज़रूरत बताई है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कहां से लाई गईं थी स्टोनहेंज की शिलाएं

हीरा तराश रॉबर्ट फिलिप्स ने 2018 में अपने 90वें जन्मदिन पर इतिहास की एक अनमोल धरोहर युनाइटेड किंगडम को लौटाने का फैसला लिया था। यह धरोहर प्रसिद्ध समारक स्टोनहेंज के केंद्र में स्थित एक शिला का 91 सेंटीमीटर लंबा बेलनाकार हिस्सा है। और अब इस हिस्से का विश्लेषण कर पुरातत्वविदों ने इस बात की पुष्टि की है कि स्मारक की सबसे बड़ी शिला का पत्थर लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित जंगल मार्लबोरो डाउंस से लाया गया था।

स्टोनहेंज का निर्माण अनुष्ठान स्थल के रूप में लगभग 3000 ईसा पूर्व शुरू हुआ था। यह बड़ी और छोटी शिलाओं को एक वृत्त में जमा कर बना है। इस स्मारक में 25 टन वजनी, 52 विशाल सिलिका शिलाएं हैं जिन्हें सारसेन्स कहा जाता है। शोधकर्ताओं का मानना था कि सारसेन्स शिलाएं मार्लबोरो डाउंस से लाई गईं थी। जबकि स्टोनहेंज के केंद्र में स्थित अन्य छोटी शिलाएं, जिन्हें ब्लूस्टोन्स कहा जाता है, लगभग 150 किलोमीटर दूर वेल्स के विभिन्न स्थलों से लाईं गई थीं।

दरअसल 1958 में फिलिप्स एक ऐसे दल का हिस्सा थे जो स्टोनहेंज की तीन सारसेन्स शिलाओं को फिर से खड़ा करने का काम कर रहा था। जब शिला क्रमांक 58 को उठाया गया तो पता चला कि वह टूट चुकी थी। इसे जोड़ने के लिए उन्होंने शिला के बीच में एक सुराख किया और धातु के बोल्ट की मदद से कस दिया। सुराख से जो टुकड़ा निकला था उसे फिलिप्स ने अपने पास रख लिया था।

चूंकि अब जब स्टोनहेंज के अवशेषों को किसी भी तरह की क्षति पहुंचाना प्रतिबंधित है, तो जब फिलिप्स ने यह टुकड़ा लौटाया तो ब्राइटन युनिवर्सिटी के पुरातत्वविद और भूगोलविद डेविड नैश और उनके साथियों को सारसेन्स शिलाओं के मूल स्थान के बारे में पता लगाने का महत्वपूर्ण साधन मिल गया।

शोधकर्ताओं ने पोर्टेबल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर की मदद से सभी 52 सारसेन्स शिलाओं की रासायनिक संरचना पता की, उन्हें नुकसान पहुंचाए बगैर। शिलाओं में 99 प्रतिशत से अधिक सिलिका के अलावा एल्यूमीनियम, कार्बन, लोहा, पोटेशियम और मैग्नीशियम सहित अन्य तत्व मौजूद थे। सभी 52 में से 50 शिलाओं की रासायनिक रचना एकदम समान थी, जिससे लगता है कि सभी शिलाएं एक ही जगह से लाई गईं थी।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने एक्स-रे स्पेक्ट्रोमेट्री से भी अधिक बारीकी से रासायनिक पहचान के लिए फिलिप्स द्वारा लौटाए टुकड़े के आधे हिस्से को चूर-चूर किया और इसका रासायनिक विश्लेषण किया। इसकी तुलना उन्होंने दक्षिणी और पूर्वी इंग्लैंड के 20 विभिन्न क्षेत्रों से लिए गए चट्टान के नमूनों से की। उन्होंने पाया कि सारसेन्स शिला का वह टुकड़ा वेस्ट वुड चट्टानी क्षेत्र के नमूने से पूरी तरह से मेल खाता है। यह क्षेत्र मार्लबोरो डाउंस के दक्षिण पूर्व में स्थित है। शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के नतीजे साइंस एडवांसेस पत्रिका में प्रकाशित किए हैं।

कुछ शोधकर्ताओं का कहना है कि तुलना के लिए अधिक इलाकों के नमूने लिए जाने चाहिए थे। लेकिन यह खुशी की बात है कि लंबे समय से शोध का केंद्र बने ब्लूस्टोन शिलाओं के इतर सारसेन्स शिलाओं का अध्ययन किया गया। शोध के मामले में सारसेन्स शिलाएं लंबे समय से उपेक्षित थीं।(स्रोत फीचर्स)

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क्या उत्परिवर्तित कोरोनावायरस अधिक खतरनाक है?

हामारी की शुरुआत में ही सार्स-कोव-2 जीनोम के 30 हज़ार क्षारों में से एक एडीनोसिन (A) से गुवानीन (G) में परिवर्तित हो गया था। जीनोम के 23,403वें स्थान पर यह उत्परिवर्तित वायरस दुनिया भर में फैल गया है। ऐसे में वैज्ञानिक जगत में यह सवाल उठा है कि क्या यह परिवर्तन इसलिए व्यापक हो गया है क्योंकि इससे वायरस को तेज़ी से फैलने में मदद मिलती है या फिर यह सिर्फ एक संयोग है?  

अभी तक स्पष्ट नहीं है कि यह वायरस भविष्य में और अधिक भयानक होने वाला है या फिर समय के साथ कमज़ोर हो जाएगा। कुछ वायरस विज्ञानियों का मत है कि पूर्व में तो मनुष्य सार्स-कोव-2 से अच्छी तरह से अनुकूलित थे लेकिन 2019 के अंत में इसका ऐसा रूप सामने आया जिसने कई लोगों को संक्रमित कर दिया। अध्ययन से पता चला है कि औसतन इस वायरस के जीनोम में प्रति माह 2 उत्परिवर्तन होते हैं। अधिकांश परिवर्तन वायरस के व्यवहार को प्रभावित नहीं करते हैं जबकि कुछ परिवर्तन रोग की गंभीरता को ज़रूर बदल देते हैं। 

परिवर्तन का एक मामला ओआरएफ-8 नामक जीन की 382 क्षार जोड़ियों के विलोपन के साथ हुआ। साल 2003 में कोरोनावायरस के करीबी सार्स के जीन में भी इसी तरह का विलोपन हुआ था। बाद में प्रयोगशाला में किए गए अध्ययन से पता चला था कि यह संस्करण कम कुशलता से प्रतिकृतियां बनाता था। लगता है कि सार्स महामारी को धीमा करने में इसका हाथ था। लेकिन सेल कल्चर प्रयोगों से पता चलता है कि सार्स-कोव-2 के प्रसार पर उत्परिवर्तन का कोई गंभीर प्रभाव नहीं पड़ा है। इससे रोग के कम गंभीर होने के संकेत मिले हैं। 

सार्स-कोव-2 में 23,403वें स्थान पर उत्परिवर्तन ने मानव कोशिकाओं से जुड़ने वाले वायरस की सतह पर उपस्थित प्रोटीन स्पाइक में परिवर्तन किया है। इस उत्परिवर्तन को G614 नाम दिया गया है। सेल में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला है कि वायरस का  G614 संस्करण अब सभी देशों में सामान्य रूप से पाया जाने लगा है जबकि मूल संस्करण लगभग सभी जगह से खत्म हो गया है। प्रयोगों से पता चलता है कि G614 मूल वायरस की तुलना में 1.2 गुना ज़्यादा तेज़ी से फैलता है। सेल कल्चर प्रयोगों से यह भी पता चला है कि G614 संस्करण वाले स्पाइक प्रोटीन कोशिकाओं में प्रवेश करने में अधिक सक्षम हैं। G614 के स्पाइक में मामूली परिवर्तन से प्रोटीन में संरचनात्मक बदलाव हुए हैं जिससे वायरस की झिल्ली और मनुष्य की कोशिकाओं का जुड़ना आसान हो गया है। पता चला है कि यह वायरस तीन से दस गुना अधिक संक्रामक हो गया है। लेकिन कई वैज्ञानिकों का कहना है कि कल्चर में वायरस के व्यवहार के आधार पर वास्तविक परिस्थिति के बारे में सीधे-सीधे निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए गंधबिलाव जैसे जंतुओं पर प्रयोग ज़रूरी हैं।

एक सवाल यह भी है कि इतना फैल जाने के बाद भी उत्परिवर्तन इसके व्यवहार को प्रभावित क्यों नहीं कर पाए हैं? वैज्ञानिकों का मानना है कि अभी शायद वायरस पर कोई चयन दबाव नहीं है क्योंकि इतने सारे असंक्रमित व्यक्ति प्रसार के लिए मौजूद हैं। हो सकता है कि टीका या नए उपचारों के आगमन के साथ स्थिति बदल जाए।(स्रोत फीचर्स)

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गरीबों को महामारी के खिलाफ तैयार करना – भाग 2 – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

दीहिंदू के 19 जुलाई के अंक में प्रकाशित मेरे लेख गरीबों को महामारी के खिलाफ तैयार करना पर मिले सुझावों और समालोचना से प्रेरित होकर इस लेख का दूसरा परिवर्धित भाग लिखा गया है।

पहला अपडेट है फ्रंटियर्स इन एंडोक्रायनोलॉजी पत्रिका के 9 अगस्त 2019 के अंक में प्रकाशित सी.वी. हरिनारायण और एच. अखिला का एक विस्तृत और प्रमाणिक पेपर (आधुनिक भारत और जुड़वां पोषक तत्व कैल्शियम और विटामिन डी की कमी की कहानी पिछले 50 वर्षों का पोषण सम्बंधी डैटा जांच, आत्मनिरीक्षण और संभावना)। डॉ. हरिनारायण इस क्षेत्र में दशकों से काम कर रहे हैं, परीक्षण कर रहे हैं और तिरुपति और अन्य जगहों पर कैल्शियम और विटामिन डी के स्तर की तुलना ग्रामीण, शहरी, गरीब, थोड़ी बेहतर आर्थिक स्थिति वाले लोगों और सम्पन्न लोगों में कर रहे हैं। इस पेपर के संभावना वाले हिस्से में लेखकों ने कुछ आवश्यक कदम सुझाए हैं कि कैसे विशेषज्ञों की मदद और बड़े पैमाने पर पूरक पोषण के माध्यम से पोषण सम्बंधी कमियों को दूर किया जा सकता है, जिन्हें स्कूलों और कॉलेजों, और फोन, टीवी और रेडियो जैसे सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचारित करना चाहिए। (मेरा सुझाव है कि सभी को यह महत्वपूर्ण पेपर पढ़ना चाहिए – https://doi.org/10.3389/fen-do.2019.00493)। हालांकि इनमें से कई सुझावों का पहले से ही क्रियान्वयन जा रहा है, लेकिन इससे अधिक करने की आवश्यकता है।

विटामिन डी की कमी

यह दिलचस्प है कि एक तरफ जब इस पेपर में लेखक (और 2017 के पेपर में सेल्वाराजन भी) यह सवाल पूछते हैं कि सूर्य के प्रकाश से भरपूर देश में अभी भी विटामिन डी की कमी क्यों दिखती है, अन्य रिपोर्ट इस ओर ध्यान दिलाती हैं कि ग्रेट ब्रिटेन में बसे भारतीय मूल के लोगों में भी इसी तरह की कमी दिखती है (इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कार्डियोलॉजी में 2013 में पटेल द्वारा प्रकाशित पेपर, doi: 10.1016 / j.ijcard.2012.05.081)। इससे एक सवाल पैदा होता है कि क्या इस कमी के लिए कोई जेनेटिक कारक ज़िम्मेदार हैं। (त्वचा पर पड़ने वाला प्रकाश एक पूर्ववर्ती अणु बनाता है जिसे अंगों की कोशिकाओं में परिवर्तित कर विटामिन डी बनाया जाता है। यदि किसी आनुवंशिक या चयापचय त्रुटि के कारण यह विकृत हो जाता है, तो शरीर में विटामिन डी की कमी हो जाती है)। रोजर बूलोन नेचर रिव्यू एंडोक्रायनोलॉजी पत्रिका में लिखते हैं कि इस संदर्भ में कम से कम चार तरह की आनुवंशिक गड़बड़ियां हो सकती हैं। भारतीय आनुवांशिक विशेषज्ञों द्वारा देश के विटामिन डी की कमी वाले लोगों में इस संभावना की जांच-पड़ताल करना फायदेमंद होगा।

हरिनारायण और अखिला बताते हैं कि कैल्शियम की कमी ना केवल भारत के गरीबों लोगों में है बल्कि सम्पन्न लोगों में भी है। राष्ट्रीय पोषण निगरानी समिति (NNMB) के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले 50 वर्षों में औसत भारतीय आबादी में कैल्शियम का स्तर 700 युनिट प्रतिदिन से 300-400 युनिट प्रतिदिन तक गिर गया है जो कि सामान्य व आवश्यक स्तर (800-1000 युनिट प्रतिदिन) से काफी कम है। यह फिर एक सवाल पैदा करता है कि प्रतिदिन अधिकतम दूध उत्पादन करने वाले दुनिया के शीर्ष देश में यह स्थिति कैसे? दुग्ध उत्पाद कैल्शियम के समृद्ध रुाोत हैं। कैल्शियम की कमी से हड्डियां कमज़ोर होती हैं और रिकेट्स जैसी बीमारियां होती हैं। कैल्शियम विटामिन डी के कार्य के लिए भी आवश्यक है। कैल्शियम और विटामिन डी दोनों की कमी दोहरी बाधा है! इसलिए हरिनारायण और अखिला के पेपर में संभावना वाले हिस्से में सुझाव दिया गया है कि स्वस्थ भारत के लिए इन दोनों की पूरक खुराक आवश्यक है, साथ ही यह भी ज़रूरी है कि सभी स्कूल अपने छात्रों को प्रतिदिन 20-30 मिनट धूप में खड़ा करें, और एक घंटा शारीरिक व्यायाम और खेल करवाएं। इससे जो लाभ होगा वह सभी छात्रों (और शिक्षकों) को दिए जाने वाले दैनिक मध्यांह भोजन के अतिरिक्त होगा।

छिपी भूख से लड़ना

केंद्र और राज्य सरकारें, कई एनजीओ और सह्मदय लोग मुफ्त गेहूं/चावल और दाल देकर गरीबों की मदद कर रहे हैं। इसके अलावा वे चीनी, दूध और सब्ज़ियों जैसे अत्यधिक सब्सिडी वाले खाद्य पदार्थ भी दे रहे हैं। लेकिन पका हुआ भोजन नहीं देते। भारत के पोषण विशेषज्ञ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि विटामिन डी और कैल्शियम के अलावा सूक्ष्म पोषक तत्वों (जैसे, बी कॉम्प्लेक्स विटामिन, कैल्शियम प्लस, आयरन, ज़िंक, आयोडीन, सेलेनियम) से युक्त भोजन भी दिया जाना चाहिए, ताकि किसी भी संक्रमण के खिलाफ प्रतिरक्षा हासिल की जा सके। ये पूरक पोषण, पोषक तत्वों की कमी वाले लोगों की ‘छिपी भूख’ को भी शांत करेंगे। जिन कई राज्यों की आंगनवाड़ियों और स्कूलों में पका हुआ भोजन दिया जाता है, वहां वे चीज़ें भी शामिल होना चाहिए जो सब्ज़ियों के तत्वों या घटकों का बेहतर संयोजन देते हों। कई पोषण विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि दाल (या सांबर) के अलावा भोजन में पालक और अन्य हरी पत्तेदार सब्ज़ियां, फलियां, मटर, गाजर, टमाटर, आलू, दूध या दही और केले जैसे फल के अलावा ओमेगा 3 और 6 फैटी एसिड (और अंडा) शामिल होना चाहिए। इसी तरह वे यह भी बताते हैं कि संतुलित मांसाहारी भोजन कैसा हो सकता हो, जो पौष्टिक और किफायती हो।

किफायती क्या है? MSSRF की मधुरा स्वामीनाथन के अनुसार, एफएओ की खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति रिपोर्ट के अनुसार पर्याप्त पोषण से युक्त भोजन की कीमत 25 रुपए प्रति व्यक्ति प्रति भोजन पड़ती है या दो वक्त के लिए 50 रुपए प्रति व्यक्ति पड़ती है। और एक ‘तंदुरुस्त आहार’ की कीमत 100 रुपए प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पड़ती है। 37 करोड़ से अधिक गरीब लोगों वाले भारत देश के लिए यह एक बड़ा आंकड़ा है! यह स्पष्ट है कि केंद्र और राज्य सरकारों के सराहनीय प्रयासों के अलावा निजी संस्थाओं (भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय), बड़े उद्योगों और व्यक्तिगत दाताओं से योगदान मिलना चाहिए, ताकि हम 100 रुपए प्रतिदिन भोजन का खर्च वहन कर सकें। यह किया जा सकता है।

समुद्री शैवाल से पोषण

दैनिक भोजन के पोषण में समुद्री शैवाल शामिल कर सकते हैं। भारत के मुख्य भू-भाग की समुद्री तटरेखा 7500 किलोमीटर लंबी है, और इसके द्वीपों की समुद्री तटरेखा 5500 किलोमीटर लंबी है। जहां भोजन सहित अन्य उपयोग के लिए समुद्री शैवाल उगाई जाती हैं। जापान, कोरिया, चीन और अधिकांश दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश इन्हें खाते हैं। ये शाकाहारी हैं। और विटामिन, खनिज, आयोडीन और ओमेगा 3 फैटी एसिड से भरपूर हैं। भावनगर स्थित केंद्रीय नमक और समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान के डी.सी. दीक्षित द्वारा जर्नल ऑफ एक्वेटिक फूड प्रोडक्ट टेक्नॉलॉजी में एक पेपर प्रकाशित किया गया है जिसका शीर्षक है मानव भोजन के रूप में कच्छ तट के पास उगने वाली आठ उष्णकटिबंधीय मैक्रो शैवाल के पोषक, जैव रासायनिक, एंटीऑक्सिडेंट और जीवाणुरोधी क्षमता का आकलन। अब समय है कि हम भारतीय भी अपने भोजन में समुद्री शैवाल शामिल करें।(स्रोत फीचर्स)
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एक छोटी-सी चिड़िया जानती है संख्याएं

छोटी से बादामी रंग की फुर्तीली हमिंगबर्ड लंबे प्रवास के लिए जानी जाती है। लेकिन हाल ही में इनकी एक और विशेषता का पता चला है। वे रसदार फूलों को क्रम अनुसार याद रखने की क्षमता भी रखती हैं। यानी वे यह पता लगा सकती हैं कि किस स्थान पर पहले फूल खिलने वाले हैं और कहां उसके बाद। वैसे तो संख्या क्रम की ऐसी समझ काफी सरल लगती है लेकिन यह एक जटिल कौशल है जिसकी मदद से हमिंगबर्ड को भरपूर मकरंद वाले फूलों के बीच आसान रास्ता याद करने में मदद मिलती है। शोधकर्ताओं को पहली बार किसी जंगली कशेरुकी जीव में इस क्षमता का पता चला है।  

प्रयोगशाला में प्रशिक्षित कई जीव, जैसे चूहे, गप्पी और बंदर चीज़ें गिन सकते हैं और यह भी समझ सकते हैं कि किसी क्रम में कोई चीज़ कहां फिट होती है। लेकिन प्राकृतिक स्थिति में इस क्षमता तथा इसके उपयोग के बारे में ज़्यादा कुछ मालूम नहीं था।

इसके लिए युनिवर्सिटी ऑफ सेंट एंड्रयूज़ की जीव विज्ञानी सुज़न हीली और उनके सहयोगियों ने हमिंगबर्ड (Selasphorusrufus) के नर को अध्ययन के लिए चुना। ये सिर्फ 8 सेंटीमीटर लंबे होते हैं और इनके भोजन के क्षेत्र अच्छी तरह से परिभाषित होते हैं और उन्हें अपने इलाके के भूगोल का भी अच्छा ज्ञान होता है। इसके अलावा ये पक्षी एक रसीले फूल से दूसरे तक जाने के लिए कार्यक्षम मार्ग का उपयोग करते हैं।

इस तरह से मार्ग बनाने की क्षमता ने शोधकर्ताओं को काफी प्रभावित किया। क्या वे यूं ही एक लक्ष्य से दूसरे लक्ष्य की ओर जाते हैं या फिर वे यह काम एक क्रम में करते हैं? इसका पता लगाने के लिए शोधकर्ताओं ने उत्तरी अमेरिका के पथरीले पहाड़ों में फीडर्स (भोजन के पात्र) रखे जिनमें मकरंद जैसा रस था। यह प्रयोग मई के महीने में किया गया जब हमिंगबर्ड्स उस क्षेत्र में आना शुरू करते हैं। शोधकर्ताओं ने देखा कि भोजन के लिए पक्षी एक विशेष फीडर का ही उपयोग करता है और अन्य पक्षियों से अपने इलाके की रक्षा भी करता है। ऐसे पक्षियों को पकड़कर चिंहित कर दिया गया। ऐसे 9 चिंहित पक्षियों को कृत्रिम फूल से भोजन प्राप्त करने का प्रशिक्षण दिया। कृत्रिम फूल और कुछ नहीं पीले फोम की एक चकती थी जिसके बीच में एक नली में मकरंद भरा था।

पक्षियों में संख्या क्रम की समझ को देखने के लिए शोधकर्ताओं ने 10 एक जैसे कृत्रिम फूलों को पंक्तिबद्ध किया। उन्होंने पहले फूल में रस डाला और देखा कि हमिंगबर्ड किस फूल की ओर जाते हैं। सभी पक्षी समान रूप से पहले फूल की तरफ ही गए। कभी-कभार वे अन्य फूलों को भी देख लेते थे कि कहीं उनमें रस तो नहीं है।

इसके बाद टीम ने फूलों को पुन:व्यवस्थित करना शुरू किया ताकि पक्षियों को न पता लग सके कि किस फूल में रस है। इसके बाद भी पक्षियों ने पंक्ति में पहला फूल चुना जिससे पता चलता है कि उनमें ‘पहले’ की समझ है। इसके बाद जब टीम ने पूरे प्रयोग को फिर से दोहराया और पंक्ति में, उदाहरण के लिए तीसरे फूल, में रस डाला। तब उन्होंने पाया कि सभी पक्षी सीधे तीसरे फूल की ओर जा रहे हैं। इससे पता चलता है कि वे पंक्ति में तीसरे फूल को पहचानते थे।

प्रोसीडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसाइटी बी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार इस अध्ययन से पता चलता है कि हमिंगबर्ड्स में संख्या क्रम की समझ होती है और वे इसे कुशलता से भोजन की तलाश के लिए उपयोग करते हैं। वैसे यह प्रयोग इस संभावना को निरस्त नहीं करता कि भोजन की तलाश के लिए विभिन्न पक्षी विभिन्न रणनीतियों का उपयोग करते हों।(स्रोत फीचर्स)

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रंग बदलती स्याही बताएगी आपकी थकान

जकल स्मार्ट वॉच या इलेक्ट्रॉनिक पैच जैसे पहने जा सकने वाले इलेक्ट्रॉनिक संवेदी उपकरण की मदद से रक्तचाप, रक्त शर्करा की मात्रा वगैरह की निगरानी करना संभव है। और अब एडवांस्ड मटेरियल में प्रकाशित एक ताज़ा अध्ययन कहता है कि रंग बदलने वाली स्याही स्वास्थ्य जांच और पर्यावरण निगरानी में सहायक हो सकती है।

टफ्ट्स युनिवर्सिटी की सिल्कलैब के बायोमेडिकल इंजीनियर फियोरेन्ज़ो ओमेनेटो और उनके साथियों द्वारा तैयार यह नई रेशम-आधारित स्याही आसपास मौजूद रसायनों की उपस्थिति और मात्रा के बारे में बता सकती है। इस स्याही से रंगे कपड़ों का रंग पसीने के संपर्क में आने पर बदल जाता है, या कमरे में कार्बन मोनोऑक्साइड के प्रवेश करने पर कपड़ों पर बने चित्रों या डिज़ाइन का रंग बदल जाता है। इस स्याही को टी-शर्ट से लेकर तम्बू तक, किसी भी चीज़ पर इस्तेमाल किया जा सकता है।

वैसे तो शोधकर्ता इसके पहले दस्तानों या पैबंद पर इंकजेट प्रिंटर की मदद से स्प्रे करके छोटे सेंसर उपकरण बना चुके थे। लेकिन अब वे स्याही को कई तत्वों के साथ बड़ी चीज़ों पर प्रिंट करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने स्याही को सोडियम एल्जिनेट की मदद से गाढ़ा किया और उसमें विभिन्न अभिक्रियाशील पदार्थ मिलाए। रेशम-आधारित स्याही बनाने के लिए उन्होंने रेशम को उसके घटक प्रोटीन्स में तोड़ा, और फिर उन्हें पानी में निलंबित किया। इसके बाद उन्होंने इसमें अभिक्रियाशील रसायनों (जैसे पीएच-संवेदी सूचक और लैक्टेट ऑक्सीडेज़) मिलाए और देखा कि आसपास के वातावरण में परिवर्तन होने पर इसका परिणामी रंग कैसे बदलता है? इस स्याही से रंगे कपड़ों को पहनने पर इसमें मौजूद पीएच सूचक त्वचा के स्वास्थ्य या निर्जलीकरण के बारे में बता सकते हैं; लैक्टेट ऑक्सीडेज़ व्यक्ति की थकान के स्तर को माप सकता है। कपड़ों पर इन परिवर्तनों को आंखों से देखा जा सकता है, लेकिन विविध रंग में बदलाव को देखने और उनका डैटाबेस तैयार करने के लिए शोधकर्ताओं ने इसमें एक कैमरा-इमेजिंग विश्लेषण तकनीक का भी उपयोग किया है।

हुवाई विश्वविद्यालय के मैकेनिकल इंजीनियर टायलर रे कहते हैं कि आजकल उपलब्ध अधिकांश पहनने योग्य मॉनीटर कठोर, तार वाले और अपेक्षाकृत भारी होते हैं। वे आगे कहते हैं कि इस नई स्याही तकनीक में उपभोक्ता द्वारा शौकिया तौर पर पहनी जाने वाली वस्तुओं को नैदानिक उपकरणों में बदलने की क्षमता है जो चिकित्सकों को कार्रवाई-योग्य जानकारी दे सकती है। लेकिन किसी भी वर्णमापक तकनीक के साथ एक समस्या यह होती है कि विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियां इसकी सटीकता को प्रभावित करती हैं, जैसे प्रकाश या कैमरा। अध्ययनों में इन मुद्दों पर ध्यान देने की ज़रूरत है।(स्रोत फीचर्स)

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चमगादड़ 6.5 करोड़ वर्ष से वायरसों को गच्चा दे रहे हैं

भी तक सार्स-कोव-2 वायरस लगभग 1.5 करोड़ लोगों को बीमार कर चुका है लेकिन चमगादड़ों का ऐसे वायरसों के साथ जीने का काफी पुराना इतिहास रहा है। चमगादड़ परिवार की छह प्रजातियों के हालिया अनुक्रमित जीनोम से पता चला है कि वे पिछले 6.5 करोड़ वर्षों से वायरस को बड़ी चालाकी से गच्चा दे रहे हैं।

गौरतलब है कि विश्व में चमगादड़ों की 1400 से अधिक प्रजातियां हैं। ये 2 ग्राम से लेकर 1 कि.ग्रा. से भी अधिक वज़न के होते हैं। कुछ तो 41 वर्ष की उम्र तक जीते हैं जो उनके आकार के हिसाब से काफी अधिक है। इनमें कोरोनावायरस सहित सभी प्रकार के वायरस बिना किसी कुप्रभाव के पाए जाते हैं। चमगादड़ों के इस रहस्य की खोज करने के लिए वर्ष 2017 में एक अंतर्राष्ट्रीय टीम ने बैट 1k परियोजना की शुरुआत की थी। इस परियोजना के तहत चमगादड़ों की समस्त प्रजातियों के जीनोम का अनुक्रमण करने का लक्ष्य है। नेचर में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार अब तक छह जीनोम का अध्ययन पूरा हो गया है। 

शोधकर्ताओं द्वारा इन नव अनुक्रमित जीनोम की तुलना 42 विभिन्न स्तनधारियों के जीनोम से की गई। उन्होंने पाया कि अनुमान के विपरीत चमगादड़ों के सबसे करीबी रिश्तेदार छछूंदर, लीमर या चूहे नहीं बल्कि इनके पूर्वज उन स्तनधारियों के भी पूर्वज हैं जो अंतत: घोड़े, पैंगोलिन, व्हेल और कुत्तों में विकसित हुए।

आगे विश्लेषण से पता चला है कि चमगादड़ कम से कम ऐसे 10 जीन्स को निष्क्रिय कर चुके हैं जो अन्य स्तनधारियों में संक्रमण के खिलाफ शोथ (इन्फ्लेमेशन) प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं। इसके अलावा उनमें वायरस-रोधी जीन्स की अतिरिक्त प्रतियां और परिवर्तित रूप भी पाए गए जो रोगों के प्रति उनकी उच्च सहनशीलता की व्याख्या करते हैं। इसके साथ ही चमगादड़ों के जीनोम में पूर्व-वायरल संक्रमण से प्राप्त डीएनए के टुकड़े पाए गए जो वायरस की प्रतिलिपियां बनते समय चमगादड़ के जीनोम में जुड़ गए होंगे। वायरल डीएनए के इन टुकड़ों के अध्ययन के आधार पर टीम का कहना है कि अन्य स्तनधारियों की तुलना में चमगादड़ों में अधिक वायरल संक्रमण हुए हैं। इससे चमगादड़ों में वायरल संक्रमण को सहन करने और अधिक कुशलता से जीवित रहने की क्षमता उजागर होती है।

यह विश्लेषण चमगादड़ों में शिकार करने के तरीके के रूप में प्रतिध्वनि की मदद से स्थान-निर्धारण (इकोलोकेशन) की वैकासिक उत्पत्ति का खुलासा करने में भी सहायक हो सकता है। अगले वर्ष तक बैट 1k परियोजना के तहत 27 अन्य जीनोम अनुक्रमित करने की योजना है जिनमें प्रत्येक प्रजाति के एक चमगादड़ को लिया जाएगा। इस परियोजना की सह-संस्थापक और युनिवर्सिटी कॉलेज डबलिन की जीव विज्ञानी एमा टीलिंग इस परियोजना को जारी रखने के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त करने की कोशिश कर रही हैं।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक और बहुग्रही सौर मंडल

हाल ही में युरोपियन सदर्न ऑब्ज़र्वेटरी की विशालकाय दूरबीन की सहायता से सूर्य के समान एक दूरस्थ तारे की परिक्रमा करते 2 ग्रहों को देखा गया।

पृथ्वी से लगभग 300 प्रकाश वर्ष दूर यह तारा, TYC 8998-760-1, दिखने में तो हमारे सूर्य के समान है लेकिन यह सूर्य से लगभग साढ़े चार अरब वर्ष बाद पैदा हुआ था। मई में अध्ययन के दौरान खगोलविदों की टीम ने पाया कि गैस का बना एक विशाल ग्रह इस तारे की परिक्रमा कर रहा है। उसूलन इसे TYC 8998-760-1बी नाम दिया गया। इसके सिर्फ 2 महीने बाद इसी टीम ने उसी तारे की परिक्रमा करते हुए एक और ग्रह का पता लगाया जिसे TYC8998-760-1सी का नाम दिया गया। यह ग्रह TYC8998-760-1 से और भी अधिक दूर पाया गया।

इस खोज को एस्ट्रोफिज़िकल जर्नल लेटर्स में प्रकाशित किया गया है। क्योंकि पहली बार हमारे सूर्य के समान एक बहुग्रही सिस्टम को प्रत्यक्ष रूप से देखा गया है, इस खोज को ग्रह अध्ययन के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। केयू लेवेन, बेल्जियम की खगोलविद और इस अध्ययन की सह-लेखक मैडलिना रेजियानी और उनकी टीम गैस के बने इन दो विशाल ग्रहों की तस्वीर लेने में कामयाब रही है।(स्रोत फीचर्स)

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कुत्ते पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग करते हैं

कुत्ते अपनी सूंघने की क्षमता के लिए प्रसिद्ध हैं लेकिन एक नए अध्ययन से पता चला है कि उनमें चुंबकीय कम्पास जैसी संवेदी प्रतिभा भी होती है। यह क्षमता उन्हें अपरिचित इलाकों में पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की मदद से छोटा रास्ता ढूंढने में मदद करती है।

यह तो पहले से अंदाज़ा था कि कुत्ते जैसे कई जानवर (और शायद इंसान भी) पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र को महसूस कर सकते हैं। 2013 में चेक युनिवर्सिटी ऑफ लाइफ साइंसेज़, प्राग के संवेदना पारिस्थितिकीविद हाइनेक बर्डा और उनके साथियों ने बताया था कि कुत्ते मूत्र या मल त्याग करते समय खुद को उत्तर-दक्षिण में उन्मुख करते हैं। इससे उन्हें अपने इलाके को चिन्हित करने और पहचानने में मदद मिलती है। लेकिन स्थिर अवस्था में दिशा ज्ञान और चलते-फिरते दिशा निर्धारण में फर्क होता है।

इस बारे में अधिक पड़ताल के लिए शोधकर्ताओं ने चार कुत्तों पर वीडियो कैमरा और जीपीएस ट्रैकर्स लगाए और उन्हें जंगल की सैर कराने ले गए। कुत्ते किसी गंध का पीछा करते हुए करीब 400 मीटर तक भागे। लौटकर आने में दो तरह के व्यवहार दिखे। पहला व्यवहार डब्ड ट्रैकिंग था। इसमें कुत्तों ने संभवत: गंध का पीछा करते हुए वापसी के लिए वही रास्ता अपनाया जिससे वे गए थे। दूसरा व्यवहार स्काउटिंग था जिसमें कुत्तों ने वापसी के लिए बिना मुड़े-पीछे देखे एकदम नया रास्ता लिया था।

अध्ययन में शोधकर्ताओं का ध्यान इस बात पर गया कि कुत्तों के स्काउटिंग व्यवहार में वापस आते समय कुत्ते बीच में रुके और रास्ता तय करने के पहले उत्तर-दक्षिण दिशा में लगभग 20 मीटर दौड़े। लगता था कि इस तरह चुंबकीय क्षेत्र की सीध में आने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन इस बात को पक्के तौर पर कहने के लिए शोधकर्ताओं के पास पर्याप्त डैटा नहीं था।

इसलिए शोधकर्ताओं ने यही अध्ययन 27 कुत्तों के साथ किया। लगभग 223 बार स्काउटिंग व्यवहार देखा गया। वापसी में कुत्तों ने औसतन 1.1 किलोमीटर की दूरी तय की। 223 बार में से 170 में कुत्ते मुड़ने के पहले रुके और उत्तर-दक्षिण दिशा में लगभग 20 मीटर तक दौड़े। जब कुत्तों ने ऐसा किया तो वे मालिक के पास अधिक सीधे रास्ते से पहुंचे। ये नतीजे ईलाइफ में पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।

अध्ययन में कई सावधानियां बरती गई थीं। जैसे कुत्तों को किसी भी तरह मार्ग सम्बंधी संकेत नहीं मिलने दिया गया। कुत्तों को जंगल के अपरिचित स्थानों पर ले जाया गया। उनके मालिक कुत्तों के पलटने के पहले ही छिप गए। और वापसी के वक्त हवा का रुख उनके मालिकों की ओर से नहीं था यानी वे गंध की मदद से रास्ता तलाश नहीं कर सकते थे। शोधकर्ताओं का विचार है कि कुत्तों ने पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से सीध के आधार पर वापसी का मार्ग तय किया।

अन्य शोधक्रताओं का कहना है कि यह तय करना बहुत मुश्किल है कि यहां 100 फीसदी चुंबकीय-संवेदना ही काम कर रही है। अलबत्ता, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी कि कुत्ते चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग कर सकते हैं। हो सकता है कि यह एक प्राचीन क्षमता है जो लंबी दूरी तय करने वाले प्राणियों में पाई जाती है।

शोधकर्ता अब कुतों की कॉलर पर चुंबक बांध कर स्थानीय चुंबकीय क्षेत्र में बाधा पहुंचा कर फिर से इसी तरह के प्रयोग दोहराकर देखना चाहते हैं कि क्या इससे उनके मार्ग निर्धारण में बाधा आती है।(स्रोत फीचर्स)

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संयुक्त अरब अमीरात का मंगल मिशन

ब 2014 में संयुक्त अरब अमीरात ने यह घोषणा की थी कि वह दिसंबर 2021 में देश के 50वें स्थापना दिवस के मौके पर मंगल ग्रह पर अपना मिशन भेजेगा, तो खगोलीय बाधाओं को देखते हुए यह एक मुश्किल बात लग रही थी। उस समय, अमीरात के पास कोई अंतरिक्ष एजेंसी नहीं थी और ना ही खगोल वैज्ञानिक थे। उसने तब अपना सिर्फ एक उपग्रह प्रक्षेपित किया था। युवा इंजीनियरों की तेज़ी से बनती टीम को अक्सर एक ही बात सुनने को मिलती थी कि यह तो चिल्लर पार्टी है, मंगल तक कैसे पहुंचेगी?

अब छह साल बाद कंप्यूटर विज्ञानी सारा अल अमीरी के नेतृत्व में अल-अमल (यानी उम्मीद) ऑर्बाइटर जापान के तानेगाशिमा स्पेस सेंटर से 19 जुलाई को प्रक्षेपित हो गया है। सात महीनों का सफर तय कर फरवरी 2021 में यह मंगल ग्रह की कक्षा में प्रवेश करेगा।

सारा के अनुसार यह सफर आसान नहीं था। अमीरात सिर्फ 14 सालों से अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर काम कर रहा था और उसका काम पृथ्वी के उपग्रह बनाने और प्रक्षेपित करने तक सीमित था। अन्य ग्रह पर भेजा जाने वाला अंतरिक्ष यान तैयार करना उसके लिए नया था। ‘इसलिए हम एकदम शून्य से शुरू करने की बजाए दूसरों से सीख कर आगे बढ़े। मिशन को पूरा करने में हमें युनिवर्सिटी ऑफ कोलोरेडो, एरिज़ोना स्टेट युनिवर्सिटी और युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया टीम की मदद मिली। अल-अमल के साथ संपर्क बनाए रखने में नासा का डीप स्पेस नेटवर्क मदद करेगा।’

अल-अमल ऑर्बाइटर मंगल ग्रह के मौसम उपग्रह की तरह काम करेगा, जो मंगल का पहला मौसम उपग्रह होगा। यह मंगल के निचले वायुमंडल के बारे में जानकारी इकट्ठी करेगा, जिससे यह समझने में मदद मिलेगी कि पूरे साल के दौरान मंगल पर मौसम कैसे बदलते हैं। इसकी मदद से मंगल ग्रह पर चलने वाली धूल की आंधियों के बारे में समझने में भी मदद मिलेगी, जो मंगल ग्रह को पूरी तरह ढंक देती हैं।

मंगल के वायुमंडल की पड़ताल के लिए अल-अमल ऑर्बाइटर में तीन तरह के उपकरण हैं। दो उपकरण इंफ्रारेड और अल्ट्रावायलेट प्रकाश में वायुमंडल की पड़ताल करेंगे और एक इमेजर मंगल की रंगीन तस्वीरें लेगा।

अल-अमल का पथ दीर्घवृत्ताकार होगा। इस पर घूमते हुए वह हर 55 घंटे में सतह के करीब होगा। इससे वह एक ही जगह का अवलोकन विभिन्न समय पर कर सकेगा। बहरहाल अल-अमल के मंगल पर सुरक्षित पहुंचकर डैटा भेजने का इंतज़ार है।(स्रोत फीचर्स)

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