
प्राचीन रोम में भेड़ों को एक रोग हुआ करता था – इसमें भेड़ों के शरीर पर फफोले बन जाते थे। यह शीपपॉक्स का एक सामान्य लक्षण है। यह रोग बहुत घातक है और भेड़ों के पूरे के पूरे झुंड का सफाया कर सकता है। इस रोग की उत्पत्ति एक पहेली ही रही है।
अब, साइंस एडवांसेस में प्रकाशित एक अध्ययन में युनिवर्सिटी कॉलेज डबलिन के जेनेटिक विज्ञानी केविन डैली के नेतृत्व में एक शोध समूह ने इस पहेली का आश्चर्यजनक खुलासा किया है। इस रोगजनक का पता मध्य युग की पुस्तकों और कानूनी दस्तावेज़ों की खोजबीन से मिला है। ये पुस्तकें और दस्तावेज़ पार्चमेंट पर लिखे गए थे। गौरतलब है कि पार्चमेंट जानवरों की खाल को विशेष रूप से उपचारित करके बनाया जाता है। एक समय था जब इसका इस्तेमाल कागज़ के तौर पर होता था।
दरअसल, ये शोधकर्ता मध्ययुगीन पांडुलिपियों की उत्पत्ति का अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने कुछ पन्नों को इरेज़र से रगड़ा और इस तरह निकले बुरादे में से डीएनए निकाला। गौरतलब है कि डीएनए आनुवंशिक पदार्थ होता है जिसका उपयोग सजीवों के अध्ययन के लिए किया जाता है।
सबसे पहली हैरत की बात तो यह थी कि पार्चमेंट में से डीएनए निकाला जा सका क्योंकि किताबों के पन्ने बनने से पहले गाय, बकरी या भेड़ों की खाल को कई दिनों तक चूने से भरे गड्ढे में रखा जाता है। चूना काफी शक्तिशाली रसायन है। इसके बाद इन खालों को निकालकर खुरचा जाता है और हाथों से ताना जाता है। इसके अलावा, लिखित पांडुलिपियां सदियों पुरानी हैं और उनकी तरह-तरह से उठा-पटक हुई होगी। यानी पार्चमेंट को विघटित होने का पर्याप्त समय मिला है। फिर भी यह अचरज की बात रही कि संग्रहालयों और मठों की अलमारियों में सजी पांडुलिपियों में पर्याप्त साबुत डीएनए था और साथ ही उन वायरसों तथा अन्य रोगजनकों के डीएनए भी मिले जिन्होंने उन जानवरों को संक्रमित किया था। इनमें शीप-पॉक्स के वायरस की एक विलुप्त किस्म का डीएनए भी मिल गया। यानी प्राचीन रोगजनकों का एक नया स्रोत हाथ लगा है।
इसके पीछे एक कारण तो यह है कि एक-एक किताब बनाने के लिए जितने जानवरों की ज़रूरत होती है वह लगभग एक पूरी आबादी के बराबर होती है। कहने का मतलब है कि जब आप उस समय की एक किताब उठाते हैं तो आप भेड़ों या अन्य जानवरों के एक पूरे झुंड को हाथ में ले लेते हैं।
शोधकर्ताओं ने एक काम और किया। 700 ईस्वी से 1450 ईस्वी के बीच की पांडुलिपियों का विश्लेषण करके वे इस नतीजे पर पहुंचे कि इन सब नमूनों का एक साझा पूर्वज था जो भेड़-विशिष्ट बीमारी के वाहक के रूप में करीब पांच हज़ार साल पहले विकसित हुआ था।
आम तौर पर पुस्तकों और पांडुलिपियों को दार्शनिक/साहित्यिक ज्ञान का भंडार माना जाता है। लेकिन इस अध्ययन ने दर्शाया है कि वे जीव वैज्ञानिक सूचना का स्रोत भी हो सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)
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