
टैटू बनवाने का चलन बढ़ता जा रहा है। इस प्रक्रिया में टैटू के स्थान पर सूजन, लालपन, खुजली वगैरह आम बात हैं। ये सब टैटू बनवाने की प्रक्रिया के प्रति हमारे प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया के कारण होते हैं। दरअसल, टैटू का स्थायी रूप से बने रहना प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया की बदौलत ही होता है। लेकिन कई अध्ययनों से पता चला है कि टैटूकरण का हमारे प्रतिरक्षा तंत्र पर दीर्घकालिक असर भी होता है। कुछ अध्ययन बताते हैं कि इससे कैंसर की संभावना भी बढ़ती है।
वर्ष 2024 में लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया था कि टैटू-धारी व्यक्तियों में लिम्फोमा की संभावना 21 प्रतिशत अधिक होती है। लिम्फोमा लसिका तंत्र को प्रभावित करता है। इसी प्रकार, डेनमार्क में 2700 जुड़वाओं के एक अध्ययन के निष्कर्ष बीएमसी पब्लिक हेल्थ में वर्ष 2025 में प्रकाशित हुए थे। इसमें पता चला था कि बड़े-बड़े टैटू-धारी लोगों में त्वचा के कैंसर का जोखिम 62 प्रतिशत अधिक था और लिम्फोमा का खतरा तीन गुना तक बढ़ गया था।
अलबत्ता, इन अध्ययनों से टैटू और कैंसर के जोखिम के बीच का सम्बंध तो नज़र आता है लेकिन यह प्रमाणित नहीं होता है कि कैंसर का जोखिम टैटू के कारण ही बढ़ा है। और तो और, वर्ष 2025 में जर्नल ऑफ दी नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि बड़े-बड़े तीन या चार टैटू-धारी लोगों में मेलेनोमा (त्वचा कैंसर की एक किस्म) का जोखिम सामान्य लोगों की तुलना में 74 प्रतिशत कम था।
लेकिन यह रोचक सवाल अभी भी मुंह बाए खड़ा है – शरीर के अंदर पहुंचने के बाद टैटू की स्याही करती क्या है और जोखिम कैसे उभरते हैं? टैटू बनवाने का चलन बढ़ने के बाद यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो चला है। इस मामले में येल स्कूल ऑफ मेडिसिन के क्रिस्टोफर ब्यूनिक कहते हैं, “घबराने की बजाय यह समझने की ज़रूरत है कि टैटू की स्याही की प्रकृति क्या होती है और उनमें किस तरह की भारी धातुओं और कैंसरकारी पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है।”
विशेषज्ञ इस बात को पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि टैटू और कैंसर के बढ़े हुए जोखिम के बीच क्या कड़ी है। बहरहाल, कई कयास लगाए गए हैं।
एक बात तो यह है कि टैटू भले ही सिर्फ चमड़ी पर नज़र आते हैं, लेकिन वे त्वचा के अंदर तक फैले होते हैं। जब टैटू की स्याही को चुभोकर त्वचा में गहराई तक पहुंचाया जाता है तो संभव है कि उसके महीन कण घूम-फिर कर लसिका ग्रंथियों में पहुंच जाएं और शोथ पैदा करें। ज़ाहिर है आपका शरीर स्याही को परदेशी (पराया) पदार्थ मानकर प्रतिरक्षा तंत्र को उसके खिलाफ तैनात कर देगा।
इस मामले में एक अध्ययन जंतुओं पर किया गया था। शोधकर्ताओं ने चूहों के पैरों की गद्दियों पर काली, लाल व हरी स्याहियों का उपयोग करके टैटू बनाए थे। स्याही डालने के बाद यह देखा गया था कि यह स्याही लसिका तंत्र से होते हुए लसिका ग्रंथियों में पहुंची। पाया गया था कि स्याही लसिका ग्रंथियों के अंदर कुछ प्रतिरक्षा कोशिकाओं (फैगोसाइट्स) में जमा हो जाती है और दीर्घावधि शोथ प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। बात और भी आगे गई – जब चूहों को दो अलग-अलग किस्म के टीके (कोविड-19 का टीका और इंफ्लुएंज़ा का टीका) दिए गए तो टैटू स्याही ने टीके के प्रति प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को प्रभावित किया। यह अध्ययन प्रोसीडिंग्स ऑफ दी (यूएस) नेशनल एकेडमी ऑफ साइन्सेस में 2025 में प्रकाशित हुए थे।
प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के अलावा टैटू से सम्बंधित कई अन्य पहलू भी हैं। जैसे टैटू स्याही में उपस्थित रसायनों में से कुछ कैंसरकारी हो सकते हैं। जैसे, काली स्याहियों में पोलीसायक्लिक एरोमैटिक हायड्रोकार्बन हो सकते हैं जो कैंसर का जोखिम बढ़ाते हैं। इसी प्रकार से लाल स्याहियों में एज़ो-रंजक हो सकते हैं जो शरीर में विघटित होकर ऐसे यौगिक बनाते हैं जो पराबैंगनी प्रकाश के संपर्क में आकर कैंसर का कारण बन सकते हैं।
इसके अलावा, कुछ टैटू स्याहियों में सीसा (लेड), कैडमियम, पारा (मर्करी) जैसी भारी धातुएं होती हैं जिनकी विषाक्तता पता है। इनमें कुछ ऐसे विलायक या फॉर्मेल्डीहाइड या फीनॉल जैसे पदार्थ हो सकते हैं जो एलर्जी पैदा करते हैं।
ऐसा लगता है कि स्याही और धातुओं के जमा होने पर तीन प्रतिक्रियाएं होती हैं जो कैंसर का जोखिम बढ़ाने के लिए जानी जाती हैं – प्रतिरक्षा तंत्र का दीर्घावधि सक्रियकरण, ऑक्सीकारक तनाव और श्वेत रक्त कोशिकाओं (लिम्फोसाइट) की असामान्य वृद्धि। ऑक्सीकारक तनाव के कारण ऊतक क्षतिग्रस्त हो सकते हैं और कैंसर का जोखिम बढ़ता है। दूसरी ओर, यदि लिम्फोसाइट्स अनियंत्रित ढंग से बढ़ने लगें तो वे स्वयं कैंसरनुमा कोशिकाओं में बदलकर ट्यूमर बन सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)
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