
जब हम अपने स्मार्टफोन पर एक 15-सेकंड की रील देखते हैं या सप्ताहांत पर नेटफ्लिक्स पर हाई-डेफिनिशन (HD) क्वालिटी में कोई वेब सीरीज़ स्ट्रीम करते हैं, या 10-15 रुपए का भी छोटा सा पेमेंट पे-टीएम के ज़रिए करते हैं तो हमें इसमें कोई गड़बड़ी, कोई प्रदूषण नहीं दिखता। क्योंकि हमारे आसपास कोई धुआं नहीं उड़ता, कोई हानिकारक गंध नहीं आती और न ही कोई दृश्य कचरा जमा होता है। कैशलेस या कागज़-मुक्त होने की बात भी ठीक ही लगती है क्योंकि कागज़ का कचरा फैलते नहीं दिखता। लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही है। हमारी इन गतिविधियों से पृथ्वी के वायुमंडल में लगातार कार्बन डाईऑक्साइड गुपचुप रूप से जुड़ रही होती है। सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का यह गुप्त पर्यावरणीय प्रभाव आज इक्कीसवीं सदी का सबसे तेज़ी से बढ़ता ‘अदृश्य संकट’ बन चुका है।
विभिन्न पर्यावरण जर्नल्स और विज्ञान संस्थानों के शोध के अनुसार, वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में संपूर्ण डिजिटल तंत्र का योगदान वर्तमान में लगभग 2.1 प्रतिशत से 3.9 प्रतिशत के बीच आंका गया है। इस तंत्र में केवल इंटरनेट का उपयोग ही शामिल नहीं है, बल्कि विशाल डैटा सेंटर्स, वैश्विक नेटवर्क केबल्स और इन उपकरणों के निर्माण की प्रक्रिया भी जुड़ी है। यह डैटा चौंकाने वाला इसलिए है क्योंकि यह वैश्विक विमानन उद्योग (लगभग 2.5 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार) के बराबर या उससे भी अधिक है।
इंटरनेट का उपयोग बढ़ने के साथ ही क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के आगमन ने बिजली की खपत को और बढ़ा दिया है। जब आप डैटा का उपयोग करते हैं, तो वह आपके डिवाइस से होते हुए स्थानीय इंटरनेट टॉवरों और अंततः विशाल डैटा सेंटर्स तक जाता है। ये डैटा सेंटर हज़ारों सर्वरों का एक नेटवर्क होते हैं जो चौबीसों घंटे चलते हैं और उन्हें चालू तथा ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में विद्युत ऊर्जा और पानी की आवश्यकता होती है। चूंकि वैश्विक स्तर पर आज भी बिजली का एक बड़ा हिस्सा कोयले या जीवाश्म ईंधनों से बनता है, इसलिए हर डिजिटल गतिविधि सीधे तौर पर कार्बन उत्सर्जन से जुड़ जाती है।
ऊर्जा के भूखे डैटा सेंटर
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर के डैटा सेंटर्स वैश्विक बिजली आपूर्ति का लगभग 1 प्रतिशत से 1.3 प्रतिशत उपभोग करते हैं। डैटा सेंटर्स और एआई एल्गोरिदम की बढ़ती मांगों के कारण यह ऊर्जा खपत वर्ष 2026 तक दुगनी होने का अनुमान है, जो पर्यावरणीय दृष्टिकोण से एक गंभीर चिंता का विषय है।
डिजिटल कार्बन पदचिंह का एक बड़ा और ओझल हिस्सा ‘डार्क डेटा’ कहलाता है। यह वह डैटा है जिसे एक बार बनाकर या इकट्ठा करके छोड़ दिया जाता है और दोबारा कभी उपयोग नहीं किया जाता। उदाहरण के लिए, हमारे इनबॉक्स में पड़े हज़ारों पुराने अनरेड ईमेल, धुंधली तस्वीरें जिनका बैकअप क्लाउड पर है, और पुरानी अप्रयुक्त फाइलें। ‘दी कार्बन लिटरेसी प्रोजेक्ट’ के अनुसार, एक सामान्य ईमेल भी अपने पीछे लगभग 4 ग्राम कार्बन पदचिंह छोड़ता है, जबकि बड़ी अटैचमेंट वाला ईमेल 50 ग्राम तक कार्बन उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार हो सकता है। लाखों-करोड़ों उपयोगकर्ताओं द्वारा छोड़े गए इस कचरे को सहेजने के लिए डैटा सेंटर्स को लगातार बिजली खर्च करनी पड़ती है।
इसके अतिरिक्त, एआई का प्रशिक्षण और संचालन इस संकट को और गहरा कर रहा है। नेचर जर्नल में प्रकाशित शोधों के अनुसार, एक विशाल भाषा मॉडल (LLM) को प्रशिक्षित करने में उतनी ही कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जित हो सकती है, जितनी पांच कारें अपने पूरे जीवनकाल में (निर्माण से लेकर कबाड़ होने तक) करती हैं। इसका कारण यह है कि एआई को प्रोसेस करने वाले विशेष चिप्स सामान्य कंप्यूटरों की तुलना में कई गुना अधिक बिजली खींचते हैं।
स्क्रॉलिंग और स्ट्रीमिंग
अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्था Greenspector द्वारा स्मार्टफोन एप्लिकेशन्स की ऊर्जा खपत पर किए गए प्रयोगशाला अध्ययनों के तहत विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को रीयल-टाइम में टेस्ट किया गया। निष्कर्षों से पता चला कि शॉर्ट-वीडियो फॉर्मेट (जैसे टिकटॉक और इंस्टाग्राम रील्स) प्रति मिनट सबसे अधिक डैटा और बिजली का उपभोग करते हैं क्योंकि इनमें वीडियो प्री-लोडिंग और एल्गोरिदम रेंडरिंग बैकग्राउंड में लगातार चलती रहती है। जब हम लगातार स्क्रॉल करते हैं, तो सर्वर पर दबाव बढ़ता है और डिवाइस की बैटरी भी तेज़ी से खत्म होती है।
समाधान: डिजिटल डीटॉक्स और ग्रीन कंप्यूटिंग
इस डिजिटल प्रदूषण को पूरी तरह से समाप्त करना आधुनिक दुनिया में व्यावहारिक नहीं है, परंतु शोधकर्ताओं ने इसके शमन के लिए कुछ अत्यंत प्रभावी और सरल उपाय सुझाए हैं जिन्हें हम अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना सकते हैं:
सही नेटवर्क का चयन: मोबाइल डैटा (4G) के मुकाबले ब्रॉडबैंड वाई-फाई नेटवर्क लगभग 4 से 5 गुना कम ऊर्जा की खपत करता है। घर या कार्यालय में वाई-फाई का उपयोग डिजिटल पदचिंह को काफी हद तक घटा देता है। वैसे, 5G तकनीक भी पुरानी 4G तकनीक की तुलना में प्रति गीगाबाइट अधिक ऊर्जा-कुशल साबित हो रही है।
ऑटो-प्ले और डिवाइस दक्षता: दी कार्बन ट्रस्ट और युनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के शोध के अनुसार, वीडियो स्ट्रीमिंग का अधिकांश कार्बन उत्सर्जन आपके घर के डिवाइस की बिजली खपत से तय होता है। वीडियो प्लेटफॉर्म पर ‘ऑटो-प्ले’ की सेटिंग को बंद रखकर और उपकरणों की ऊर्जा दक्षता को सुधारकर हम डैटा ट्रांसमिशन लोड और कार्बन उत्सर्जन दोनों को नियंत्रित कर सकते हैं।
डिजिटल स्वच्छता: अपने इनबॉक्स को नियमित रूप से साफ करना, अनावश्यक क्लाउड बैकअप को हटाना और बिना वजह वीडियो कॉल की बजाय वॉयस कॉल को प्राथमिकता देना, व्यक्तिगत स्तर पर बड़े बदलाव ला सकता है।
इंफ्रास्ट्रक्चर बदलाव की मांग: वैश्विक स्तर पर टेक कंपनियों पर यह दबाव बनाना आवश्यक है कि वे अपने डैटा सेंटर्स को 100 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा (जैसे सौर या पवन ऊर्जा) पर स्थानांतरित करें। भविष्य ‘ग्रीन कंप्यूटिंग’ का है, जहां सॉफ्टवेयर के कोड और हार्डवेयर की बनावट को इस तरह डिज़ाइन किया जाएगा कि वे कम से कम बिजली का उपयोग करें। लेकिन यह दिल्ली अभी दूर है। फिलहाल अनावश्यक डैटा उपयोग से बचने और डिजिटल आदतों के प्रति सचेत रहने में ही समझदारी है, ताकि इस अदृश्य धुएं को हमारी पृथ्वी का दम घोटने से रोका जा सके। (स्रोत फीचर्स)
Picture credit- https://escp.eu/news/reduce-your-digital-carbon-footprint-shape-greener-future