विवेक मेहता

विज्ञान की दुनिया में कई ऐसी समस्याएं हैं जो कि सालों से अनसुलझी रही हैं। इनमें से कई समस्याओं को सुलझाने के लिए बड़े-बड़े इनाम भी घोषित किए गए हैं। वैज्ञानिक अक्सर इन समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने समय की मौजूदा तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। हमारे अपने समय में जो एक तकनीक प्रभावी तौर पर उभरी है, वह है एआई यानी कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस या कृत्रिम बुद्धि। हाल ही में एक ऐसी ही समस्या पर एआई द्वारा सुझाए गए हल को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।
नेवियर स्टोक्स पहेली
सामान्य वस्तुओं की गति को समझने के लिए हम न्यूटन के नियमों की मदद लेते हैं। लेकिन अगर इन नियमों को किसी तरल की गति को समझने के लिए इस्तेमाल किया जाए तो हमें जो गणितीय समीकरण मिलता है उसे नेवियर-स्टोक्स समीकरण के नाम से जाना जाता है। यह समीकरण विमान के डिज़ाइन में, मौसम की भविष्यवाणी में, रक्त के प्रवाह को समझने में एवं पानी और हवा के प्रवाह के अध्ययन में मदद करता है। इन तमाम परिस्थितियों एवं उनसे जुड़े सवालों के अलावा वैज्ञानिक इस सवाल से भी लगातार जूझते रहते हैं कि किसी एक वास्तविक परिस्थिति की व्याख्या करता हुआ उनका कोई गणितीय मॉडल या समीकरण किस हद तक विश्वसनीय है। उसकी हद क्या है?
नेवियर-स्टोक्स समस्या के साथ भी ऐसा ही है, या कहें, ऐसी ही था। लगभग 90 वर्षों से यह सवाल अनसुलझा था कि किसी तरल की सामान्य और सुचारु त्रि-आयामी गति क्या अचानक ऐसी स्थिति में पहुंच सकती है जहां गणितीय रूप से उसका व्यवहार बिगड़ जाए? नेवियर-स्टोक्स समीकरणों के संदर्भ में कहें तो क्या ऐसा हो सकता है कि कुछ समय बाद एक भले से दिखने वाले तरल का प्रवाह अचानक इतनी तेज़ी से बदल जाए कि नेवियर-स्टोक्स समीकरणों के अनुसार उसकी गति अनंत हो जाए?
अब चूंकि हकीकत में किसी भी वस्तु की गति अनंत नहीं हो सकती, ऐसे में अगर गणितीय मॉडल में तरल की गति अनंत हो जाती है तो इसे उस मॉडल की सीमा के रूप में देखा जाएगा।
ओपनएआई (OpenAI) कंपनी ने सितंबर 2026 के शुरुआती दिनों में यह दावा पेश किया कि उनके नए एआई मॉडल ने नेवियर-स्टोक्स समस्या को सुलझा दिया है। उनके दावे के मुताबिक, एक भले से दिखने वाले प्रवाह की गति भी गणितीय मॉडल के मुताबिक अनंत हो सकती है। इसके साथ ही ओपनएआई ने इस दावे का एक गणितीय प्रमाण भी प्रस्तुत किया है। अब यह दावा कितना सही है या गलत इसकी पड़ताल तो चल ही रही होगी, लेकिन ओपनएआई ने समस्या को सुलझाने के लिए जिस प्रक्रिया को अपनाया है उस पर भी सवाल उठ रहे हैं।
विवाद
जैसा है कि हम जानते हैं एआई मॉडल ट्रेनिंग या सीखने के लिए डैटा का इस्तेमाल करते हैं। इस सीखने-सिखाने के प्रक्रिया में लगभग हर स्तर पर इंसान व इंसानों के द्वारा सृजित ज्ञान का इस्तेमाल होता है। कई दफे तो बाकायदा हाथ पकड़कर एआई या एआई एजेंट को सही हल के बारे में बताया जाता है, जैसे किसी छोटे बच्चे का हाथ पकड़कर उसे चलना सिखाया जाता है।
ओपनएआई की घोषणा से कुछ घंटे पहले न्यूयार्क युनिवर्सिटी के गणितज्ञ ट्राइस्टन बकमास्टर ने एक सम्बंधित गणितीय परिणाम प्रकाशित किया था। जिस समस्या पर बकमास्टर अपने सहयोगी लेवेंट एल्पोग के साथ काम कर रहे थे, उसे ओयलर (Euler) पहेली के नाम से जाना जाता है। अलबत्ता, यह समस्या नेवियर-स्टोक्स समस्या से मुख्य तौर पर इस मामले में अलग है कि ओयलर पहेली में तरल की श्यानता (घर्षण) को नकार दिया जाता है। बकमास्टर व एल्पोग इस पहेली पर काम करने के दौरान एआई तकनीक का सहारा भी ले रहे थे। ओपनएआई के ही एक एआई एजेंट कोडेक्स (Codex) पर लगातार पिछले कई महीनों से वे अपने काम व उससे जुड़े मसौदों को साझा कर रहे थे।
बकमास्टर ने आरोप लगाया है कि ओपनएआई जिस रास्ते से नेवियर-स्टोक्स समस्या के हल तक पहुंचा है, वह उनके ओयलर समस्या के हल से जुड़ा हो सकता है जिस पर वे पहले से काम कर रहे थे। मुख्य तौर पर बकमास्टर का कहना है कि ओपनएआई एजेंट ने समस्या को सुलझाने की प्रक्रिया में उन मसौदों से भी सीखा होगा जो कि ओपनएआई के डैटाबेस में पहले से ही मौजूद हैं। ओपनएआई ने ऐसी किसी भी संभावना को नकारा है।
लेकिन शक बे-बुनियाद नहीं है और बहस जारी है। कई गणितज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ दशकों में नेवियर-स्टोक्स समस्या पर काफी हद तक समझ बनाई जा चुकी थी और यह समस्या बस हल होने की कगार पर ही थी। ऐसे में ओपनएआई का दावा ज्ञान-सृजन की बजाय बाज़ार में अपनी छवि चमकाने व मूल्य बढ़ाने का प्रयास अधिक नज़र आता है।
एक और बात जो ओपनएआई के सुझाए गए हल पर सवाल उठाती है वह है संसाधनों को लेकर। ओपनएआई ने दावा किया कि दशकों पुरानी इस समस्या को लगभग 4-5 दिनों में ही सुलझा दिया। ऐसा करने के लिए उसने मल्टीएजेंट व्यवस्था का सहारा लिया, जिन्होंने पहले-पहल समस्या के कुछ सरल स्वरूपों पर काम किया और फिर मुख्य समस्या पर। सभी गणितीय समस्याओं को मिलाकर एजेंटों ने लगभग 49 लाख संदेश एक-दूसरे को भेजे। इन संदेशों को तैयार करने में लगभग 300 अरब आउटपुट टोकन्स का इस्तेमाल हुआ। केवल नेवियर-स्टोक्स पहेली पर एजेंटों ने लगभग 27 लाख संदेश एक-दूसरे को भेजे व लगभग 130 अरब आउटपुट टोकन्स बनाए।
अब अगर इन तमाम संदेशों के पीछे काम कर रही तकनीक और उससे जुड़े खर्चों का हिसाब लगाया जाए तो अनुमानित एक करोड़ अमरीकी डॉलर से लेकर 2.25 करोड़ अमरीकी डॉलर के बीच बैठता है। इस पहेली को सुलझाने के लिए जो इनाम था (दस लाख अमरीकी डॉलर) वह इससे कहीं कम है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह वास्तव में एआई की ‘गणितीय समझ’ की सफलता है, या बहुत बड़ी कंप्यूटेशनल शक्ति से लाखों संभावित गणितीय हलों को छांटने की सफलता?
इन जैसे तमाम सवालों को लेकर एआई पर बहस अब और भी तीखी होती जा रही है। और यह बहस अब मात्र तकनीक तक ही सीमित नहीं रह गई है। इसके राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक पहलुओं व प्रभावों पर भी लगातार चर्चा हो रही है; कई अकादमिक समूह तो एआई व इससे जुड़ी कंपनियों के खिलाफ एक मुहिम-सी छेड़ते हुए नज़र आते हैं।
सितंबर 2026 के महीने में जहां एक ओर ओपनएआई सरीखी कंपनियां कठिन समस्याओं से जुड़े अपने दावों को लेकर सामने आती दिखलाई देती हैं तो इसी महीने में एसोसिएशन ऑफ ह्यूमन मैथेमेटिशियन्स (इन्सानी गणितज्ञ संगठन) नाम से एक संस्था/समूह का जन्म भी होता है। इससे जुड़े गणितज्ञ संस्था के बारे में बतलाते हुए कहते हैं कि “इस संस्था का मुख्य उद्देश्य गणित व इसके साधकों को एआई कंपनियों के चंगुल से बचाना है। इन एआई कंपनियों के काम करने के तरीके ना केवल गणित, बल्कि पर्यावरण व वृहद समाज के लिए भी घातक हैं। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ज़रूरी है कि हम एआई माडलों के उपयोग में एक आलोचनात्मक नज़रिया अपनाएं; ना केवल शोध या उससे जुड़े कामों को करते हुए, बल्कि पढ़ने-पढ़ाने व उससे जुड़े कार्यकलापों में भी।”
एआई के दौर में पढ़ने-पढ़ाने के तरीकों पर विचार करने की ज़रूरत व ज़िम्मेदारी कई शिक्षण संस्थान महसूस भी कर रहे हैं। विश्व में तकनीकी ज्ञान सृजन व संचार के मामले में अग्रणी संस्थान MIT ने जनवरी 2026 में एक समिति का गठन किया था, जिसका उद्देश्य संस्थान में एआई के इस्तेमाल के संदर्भ में यह सुझाव देना था कि शिक्षण और मूल्यांकन को किस तरह बदला जाना चाहिए और उसके लिए संस्थागत नियम क्या होने चाहिए। इस समिति ने अपनी रपट अगस्त 2026 में सार्वजनिक कर दी है। एआई के प्रति इस रपट का नज़रिया एसोसिएशन ऑफ ह्यूमन मैथेमेटिशियन्स सरीखा तीखा तो नहीं है लेकिन समिति ने युवाओं पर हो रहे इसके असर और शिक्षकों व अन्य शैक्षणिक कर्मचारियों की ज़िम्मेदारियों की ओर इशारा करते हुए कहा है कि “ऐसा प्रतीत होता है कि एआई को तेज़ी से अपनाए जाने का प्रभाव पहले से ही विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है और इससे लंबे समय में नई चुनौतियां पैदा हो रही हैं। कुछ विद्यार्थी अपने शैक्षणिक कार्यों या भावनात्मक सहारे के लिए एआई पर निर्भर होते जा रहे हैं; उनमें अपने निर्णय और कार्य स्वयं करने की क्षमता, उद्देश्य-बोध और आत्मविश्वास की भावना कम हो रही है; और वे एआई से अत्यधिक प्रभावित दुनिया में अपने करियर की संभावनाओं को लेकर चिंतित हैं। शिक्षकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारियों को एआई से जुड़ी शैक्षणिक, सामाजिक और भावनात्मक चुनौतियों को पहचानने के लिए तैयार रहना चाहिए और विद्यार्थियों को आवश्यकता पड़ने पर उचित सहायता एवं सम्बंधित संसाधनों तक पहुंचने के लिए मार्गदर्शन देना चाहिए।”
यह रपट मानवता को केंद्र में रखकर तकनीक के इस्तेमाल की बात करती है। जिस तरह के बदलावों की अपेक्षा है उनकी ओर इशारा करते हुए कहा गया है कि एआई के इस दौर में “MIT में पढ़ाई जाने वाली अधिकांश कक्षाओं की सावधानीपूर्वक समीक्षा करनी होगी और कई मामलों में, उनमें पर्याप्त बदलाव भी करने होंगे, ताकि वे एआई के प्रभाव का सामना किसी गंभीर व्यवधान के बिना कर सकें। एआई उन शैक्षणिक मान्यताओं को चुनौती देगा, जिनके आधार पर पाठ्यक्रम की विषय-वस्तु, शिक्षण पद्धतियों और विद्यार्थियों के प्रदर्शन के आकलन के तरीकों का चुनाव किया गया है।”
संक्षेप में, अब समय आ गया है कि हम गहराई और व्यापकता के साथ इस बात पर विचार करें कि हम क्या पढ़ाते हैं और उसे कैसे पढ़ाते हैं। भविष्य की कक्षाओं की संरचना, मूल्यांकन पद्धतियां और नीतियां स्पष्ट उद्देश्य के साथ तैयार की जानी चाहिए। उन्हें केवल एआई की तत्काल वास्तविकताओं के जवाब में छोटे-मोटे बदलाव करके तैयार नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि हर पाठ्यक्रम में एक ही तरह के बदलाव करने होंगे।
कई अन्य देशों की तरह भारत में भी एआई की संभावनाओं को लेकर एक उत्साह का माहौल है। शिक्षा के क्षेत्र में भी इसे कई समस्याओं के समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है। उम्मीद है, नीति-निर्माता इस तकनीक के व्यापक असर से जुड़ी चिंताओं पर भी विचार कर रहे होंगे। दुनिया भर में लोग एआई व उसके प्रभावों को लेकर चिंतित हैं और उनकी चिंता बेवजह नहीं है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://openai.com/index/navier-stokes-solution/